पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय की वित्तीय स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन
डा. रानू अग्रवाल’, डा अमरकांत पाण्डेय
1सहायक प्राध्यापक, अर्थशास्त्र अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर, (छ.ग.)
2प्राध्यापक, अर्थशास्त्र अध्ययनशाला पं. रविशंकर श्शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर, (छ.ग.)
मानव संसाधन की गुणवत्ता के विकास में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। राज्यों को उच्च शिक्षा में मानवीय पंूजी के संग्रहण कोे प्रोत्साहित करना चाहिये। जिससे शिक्षण स्तर को बिना प्रभावित किये हुए शिक्षा को अधिक प्रभावकारी बनाया जा सके। भारत में उच्च शिक्षा में निधिकरण की समस्या है। उच्च शिक्षा में लगने वाली लागत का एक बहुत बड़ा भाग सरकार द्वारा वहन किया जाता है। प्रस्तुत अध्ययन में पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय की बजटीय स्थिति का अध्ययन किया गया है एवं इसके साथ विश्वविद्यालय की वित्तीय स्थिति का छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के पूर्व एवं पश्चात् की स्थितियों में तुलनात्मक अध्ययन किया गया हैै तथा विश्वविद्यालय की प्राप्तियों एवं व्यय के विभिन्न स्रोतों का अध्ययन अवधि में प्रवृत्ति एवं परिवर्तनशीलता का अध्ययन किया गया है। इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये द्वितीयक आंकड़ों का संकलन पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय द्वारा विभिन्न वर्षों मेेें प्रकाशित बजट एवं वार्षिक प्रतिवेदन से किया गया है। अंत में अध्ययन के विश्लेषण से प्राप्त निश्कर्षों के आधार पर उपयुक्त सुझाव प्रस्तुत किया गया है।
उच्च शिक्षा, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, प्राप्तियाॅ एवं व्यय।
प्रस्तावना
ब्रिटिश अर्थशास्त्री ‘‘जाॅन राॅबिन्सन‘‘ का यह कथन - ‘‘भारत के लिये आप जो भी कहें उसका विपरीत भी हमेशा सही होता है।‘‘ भारत में उच्च शिक्षा के संदर्भ में अत्यंत सटीक है। हमारे देश में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से वृद्धि हुई है परन्तु यह वृद्धि देश के सभी राज्यों में समान नहीं है। कुछ राज्यों में उच्च शिक्षा संस्थान अत्यंत कम है और कुछ राज्यों में उच्च शिक्षा वृद्धि देश की औसत वृद्धि से बहुत अधिक है। भारत में संघीय शासन व्यवस्था है जिसके कारण शिक्षा व्यवस्था में सरकार द्वारा विभिन्न स्तरों पर कार्य किया जाता है। शिक्षा योजनाओं को बनाने व कार्यरूप में परिणत करने के लिये शासन में बहु-स्तरीय व्यवस्था कार्यरत है। इस समय देश में शिक्षा पर तीन स्तरों - केन्द्रीय सरकार स्तर, राज्य सरकार स्तर एवं जिला स्तर पर कार्य हो रहा है। प्रारंभिक शिक्षा (कक्षा प्.टप्प्प्) जिले की प्रशासनिक जिम्मेदारी के अंतर्गत आते है, राज्य सरकार समस्त स्कूली शिक्षा के साथ विश्वविद्यालय अनुदान संस्थान की भी जिम्मेदारी साझा करता है। संविधान के अनुसार केन्द्र शासन केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की योजना एवं व्यवस्था, शोध, रख-रखाव एवं गुणवत्ता के लिये पूरी तरह जिम्मेदार है।
पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय की स्थापना सन् 1964 में मध्यप्रदेश अधिनियम (13) के अंतर्गत हुई एवं जून 1964 से विश्वविद्यालय ने कार्य करना आरंभ किया। रविशंकर विश्वविद्यालय का नाम छत्तीसगढ़ के महान स्वतंत्रता सेनानी पं. रविशंकर शुक्ल के नाम पर रखा गया, जो स्वतंत्र भारत में मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री थे। विश्वविद्यालय के पहले कुलाधिपति श्री के.सी. रेड्डी तथा कुलपति डाॅ0 बाबू राम सक्सेना थे।
विश्वविद्यालय की स्थापना के समय इससे संबंद्ध महाविद्यालयों की संख्या 46 थी एवं 5 विश्वविद्यालय शैक्षणिक संस्थान थे एवं विद्यार्थियों की संख्या 3400 थी। पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय छत्तीसगढ़ राज्य का सबसे पुराना विश्वविद्यालय है, जो 52 वर्षाें से राज्य को अपनी सेवायें प्रदान कर रहा है। विश्वविद्यालय मूलतः अध्र्दशासकीय संस्था है जो सामाजिक कल्याण हेतु संचालित है। विश्वविद्यालय का उद्देश्य आय अर्जित करना न होकर समाज के विकास में भागीदार बनना है। मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ के युवाओं को उच्च शिक्षा के सुअवसर प्रदान कर उन्हें आगे बढ़ने में सहायता देना हैै। पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय की स्थापना तब हुई थी जब छत्तीसगढ़ राज्य मध्यप्रदेश का एक भाग हुआ करता था। अध्ययन में छत्तीसगढ़ के मध्यप्रदेश से अलग होने के बाद विश्वविद्यालय की आर्थिक स्थिति का पहले की स्थिति के साथ तुलनात्मक अध्ययन किया गया है।
प्रस्तुत अध्ययन का उद्देश्य पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय की बजटीय स्थिति का अध्ययन करना एवं इसके साथ विश्वविद्यालय की वित्तीय स्थिति का छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के पूर्व एवं पश्चात् की स्थितियों में तुलनात्मक अध्ययन करना है तथा विश्वविद्यालय की प्राप्तियों एवं व्यय के विभिन्न स्रोतों की अध्ययन अवधि में प्रवृत्ति एवं परिवर्तनशीलता का अध्ययन करना। इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये द्वितीयक आंकड़ों का संकलन पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय द्वारा विभिन्न वर्षों मेेें प्रकाशित बजट एवं वार्षिक प्रतिवेदन से किया गया है। अंत में अध्ययन के विश्लेषण से प्राप्त निश्कर्षों के आधार पर उपयुक्त सुझाव प्रस्तुत किया गया है।
अध्ययन को सार्थक बनाने के लिए अध्ययन अवधि को दो भागों में विभाजित किया गया है, छत्तीसगढ़ राज्य के मध्यप्रदेश से पृथक होने के पूर्व 10 वर्ष (प्रथम अवधि 1990-91 से 1999-2000) एवं पृथक होने के पश्चात् 12 वर्ष अर्थात् द्वितीय अवधि वर्ष 2000-01 से 2011-12 तक कुल 22 वर्षों में विश्वविद्यालय की आर्थिक स्थिति का अध्ययन किया गया है, इसके साथ- साथ संपूर्ण अवधि (1990-91 से 2011-12) के लिये भी संकलित आॅकड़ों का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन में चयनित उद्देश्यों की पूर्ति के लिये जिन प्रमुख शोध प्राविधि का प्रयोग किया गया है वे इस प्रकार है:-विचरण गुणांक, संयुक्त वृद्धि दर, सहसंबंध गुणांक, सरल प्रतीपगमन विश्लेषण ।
शोधपत्र चार भागों में विभाजित है प्रथम भाग में रविशंकर विश्वविद्यालय का परिचय है। द्वितीय भाग में छत्तीसगढ राज्य निर्माण के पूर्व विश्वविद्यालय की प्राप्तियों एवं ब्यय का विश्लेषण किया गया है। तृतीय भाग में पश्चात पूर्व विश्वविद्यालय की प्राप्तियों एवं ब्यय का विश्लेषण किया गया है। चतुर्थ भाग में निश्कर्ष एव सुझाव प्रस्तुत किया गया है।
पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय की प्राप्तियाॅ एवं व्यय: प्रथम अवधि में
पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय छत्तीसगढ़ राज्य का सबसे पुराना विश्वविद्यालय है, जो 52 वर्षाें से राज्य को अपनी सेवायें प्रदान कर रहा है। पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय द्वारा शिक्षित छात्र/छात्राएं आज देश एवं विदेशों में भी विश्वविद्यालय का नाम रौशन कर रहे है। विश्वविद्यालय मूलतः अध्र्दशासकीय संस्था है जो सामाजिक कल्याण हेतु संचालित है। विश्वविद्यालय का उद्देश्य आय अर्जित करना न होकर समाज के विकास में भागीदार बनना है। मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ के युवाओं को उच्च शिक्षा के सुअवसर प्रदान कर उन्हें आगे बढ़ने में सहायता देना हैै। पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय की स्थापना तब हुई थी जब छत्तीसगढ़ राज्य मध्यप्रदेश का एक भाग हुआ करता था। अध्ययन में छत्तीसगढ़ के मध्यप्रदेश से अलग होने के बाद विश्वविद्यालय की आर्थिक स्थिति का पहले की स्थिति के साथ तुलनात्मक अध्ययन किया गया है।
तालिका 1.1 में द्वितीय अवधि में पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय की बजटीय स्थिति को प्रदर्शित किया गया है । तालिका 1.1 से स्पष्ट होता है कि वर्ष 1990-91 में विश्वविद्यालय को विभिन्न श्रोतांे से 547.71 लाख रूपये की प्राप्ति हुई थी जो वर्ष 1999-2000 में बढ़कर 1112.98 लाख रूपये हो गई। इस प्रकार 10 वर्ष की अवधि में विश्वविद्यालय की प्राप्तियों में 2.5 गुना से भी अधिक वृद्धि दर्ज की गई। इस अवधि में विश्वविद्यालय की आय की संयुक्त वृद्धि दर 8.20 प्रतिशत रही जबकि इन 10 वर्षो में आय में उच्चावचन (विचरण गुणांक) की दर 32.11 प्रतिशत पाई गई। तालिका 1.1 से स्पष्ट होता है कि वर्ष 1990-91 में विश्वविद्यालय को विभिन्न श्रोतांे से 572.03 लाख रूपये व्यय हुआ था जो वर्ष 1999-2000 में बढ़कर 1096.91 लाख रूपये हो गया। इस प्रकार 12 वर्ष की अवधि में विश्वविद्यालय के व्यय में दोगुनी वृद्धि दर्ज की गई। इस अवधि में विश्वविद्यालय की व्यय की संयुक्त वृद्धि दर 7.50 प्रतिशत रही जबकि इन 10 वर्षो में आय में उच्चावचन (विचरण गुणांक) की दर 40.67 प्रतिशत पाई गई। इसे रेखाचित्र 1.1 से स्पष्ट किया गया है।
प्रथम अवधि में सामान्य निधि खाते से व्यय में विचरण गुणांक 42.08 प्रतिशत पाया गया तथा संयुक्त वृद्धि दर 9.32 प्रतिशत आंकलित किया गया। शारीरिक शिक्षण खाते में विचरण गुणांक 67.15 प्रतिशत रहा तथा विकास अनुदान खाते में यह 65.67 प्रतिशत रहा। दोनों खातों में संयुक्त वृद्धि दर क्रमशः 19.40 प्रतिशत एवं -7.32 प्रतिशत देखा गया। इसे रेखाचित्र 1.3 से स्पष्ट किया गया है।
पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय की प्राप्तियाॅ एवं व्ययः द्वितीय अवधि में
बजट एक ऐसा दस्तावेज है जो किसी वित्तीय वर्ष में संस्था की प्राप्तियांे एवं व्यय को दर्शाता है। बजट द्वारा संस्था की नीतियाॅं एवं प्राथमिकताएं निर्धारित की जाती है। बजटीय स्थिति का अध्ययन करके कोई भी सार्वजनिक अथवा निजी संस्था वित्त का प्रबंधन करती है। कोई भी संस्था बजट का अध्ययन करके अपनी वित्तीय स्थिति का सही-सही अनुमान लगा सकती है।
तालिका 1.4 से स्पष्ट होता है कि वर्ष 2000-01 में विश्वविद्यालय को विभिन्न श्रोतांे से 1333.50 लाख रूपये की प्राप्ति हुई थी जो वर्ष 2011-12 में बढ़कर 6231.10 लाख रूपये हो गई। इस प्रकार 12 वर्ष की अवधि में विश्वविद्यालय की प्राप्तियों में साढ़े चार गुना से भी अधिक वृद्धि दर्ज की गई। इस अवधि में विश्वविद्यालय की प्राप्तियों की संयुक्त वृद्धि दर 15.04 प्रतिशत रहा जबकि इन 12 वर्षो में प्राप्तियों में उच्चावचन (विचरण गुणांक) की दर 49.12 प्रतिशत पाई गई।
तालिका 1.4 से स्पष्ट होता है कि वर्ष 2000-01 में विश्वविद्यालय का विभिन्न श्रोतांे से 1208.850 लाख रूपये व्यय हुआ था जो वर्ष 2011-12 में बढ़कर 7849.57 लाख रूपये हो गया। इस प्रकार 12 वर्ष की अवधि में विश्वविद्यालय के व्यय में 6.5 गुना से भी अधिक वृद्धि दर्ज की गई। इस अवधि में विश्वविद्यालय के व्यय की संयुक्त वृद्धि दर 18.54 प्रतिशत रही जबकि इन 12 वर्षो में व्यय में उच्चावचन (विचरण गुणांक) की दर 58.41 प्रतिशत पाया गया । इसे रेखाचित्र 1.5 से स्पष्टकिया गया है।
1.5 पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय की कुल प्राप्तियों के मुख्य रूप से तीन श्रोत अथवा मद है, जो इस प्रकार है:- अ. सामान्य निधि खाता ब.शारीरिक शिक्षण खाता स. विकास अनुदान खाता। वर्श 2000-01 से 2011-12 की अवधि हेतु विश्वविद्यालय की कुल प्राप्तियों को तालिका 1.6 में प्रदर्शित किया गया है - तालिका 1.5 के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि विश्वविद्यालय की कुल प्राप्तियों में सर्वाधिक योगदान सामान्य निधि खाते से प्राप्त आय का है। वर्ष 2000-01 में कुल प्राप्तियों में सामान्य निधि खाते से प्राप्त आय का योगदान 85.99 प्रतिशत था जबकि शारीरिक शिक्षण खाता एवं विकास अनुदान खाते में इनका प्रतिशत योगदान क्रमशः 3.09 प्रतिशत एवं 10.92 प्रतिशत पाया गया। इस प्रकार वर्ष 2000-01 में सामान्य निधि खाता के अंतर्गत विश्वविद्यालय को 1146.74 लाख रूपये की प्राप्ति हुई जो वर्ष 2011-12 में बढ़कर 3776.50 लाख रूपये हो गया किन्तु कुल प्राप्तियों में प्रतिशत योगदान की दृष्टि से इसमें कमी आई है। वर्ष 2000-01 में जहांॅ इस मद से विश्वविद्यालय की कुल प्राप्तियों में इसका प्रतिशत योगदान 85.99 प्रतिशत था वह वर्ष 2011-12 में घटकर 60.61 प्रतिशत हो गया जबकि इसी अवधि में विकास अनुदान के रूप में प्राप्तियाॅ जो वर्ष 2000-01 में 145.60 लाख रूपये थी वह वर्ष 2011-12 में बढ़कर 2414.10 लाख रूपये हो गई । इस प्रकार विकास अनुदान खाते से प्राप्तियों का प्रतिशत योगदान जो वर्श 2000-01 में 10.92 प्रतिशत था वह वर्ष 2011-12 में बढ़कर 38.74 प्रतिशत हो गया। इसे रेखाचित्र 1.5 से स्पष्ट किया गया है।
विश्वविद्यालय की कुल प्राप्तियों में सर्वाधिक योगदान सामान्य निधि खाते से प्राप्त आय का है। वर्ष 2000-01 में कुल प्राप्तियों में सामान्य निधि खाते से प्राप्त आय का योगदान 85.99 प्रतिशत था जबकि शारीरिक शिक्षण खाता एवं विकास अनुदान खाते में इनका प्रतिशत योगदान क्रमशः 3.09 प्रतिशत एवं 10.92 प्रतिशत पाया गया। इस प्रकार वर्ष 2000-01 में सामान्य निधि खाता के अंतर्गत विश्वविद्यालय को 1146.74 लाख रूपये की प्राप्ति हुई जो वर्ष 2011-12 में बढ़कर 3776.50 लाख रूपये हो गया किन्तु कुल प्राप्तियों में प्रतिशत योगदान की दृष्टि से इसमें कमी आई है। वर्ष 2000-01 में जहांॅ इस मद से विश्वविद्यालय की कुल प्राप्तियों में इसका प्रतिशत योगदान 85.99 प्रतिशत था वह वर्ष 2011-12 में घटकर 60.61 प्रतिशत हो गया जबकि इसी अवधि में विकास अनुदान के रूप में प्राप्तियाॅ जो वर्ष 2000-01 में 145.60 लाख रूपये थी वह वर्ष 2011-12 में बढ़कर 2414.10 लाख रूपये हो गई । इस प्रकार विकास अनुदान खाते से प्राप्तियों का प्रतिशत योगदान जो वर्ष 2000-01 में 10.92 प्रतिशत था वह वर्ष 2011-12 में बढ़कर 38.74 प्रतिशत हो गया। इसे रेखाचित्र 1.5 से स्पष्ट किया गया है।
पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय का राज्य निर्माण के पश्चात् कुल व्यय
वर्श 2000-01 से वर्ष 2011-12 के अवधि में विश्वविद्यालय के कुल व्यय को तालिका 1.6 मंे प्रदर्शित किया गया है। तालिका के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि वर्ष 2000-01 में विश्वविद्यालय का कुल व्यय 1208.80 लाख रूपये थे, जो वर्ष 2011-12 में बढ़कर 7849.57 लाख रूपये हो गया। इस अवधि में विश्वविद्यालय के कुल व्यय में संयुक्त वृद्धि दर 18.54 प्रतिशत थी जबकि उच्चावचन अर्थात विचरण गुणांक 58.4 प्रतिशत पाया गया। सारणी के अवलोकन से इस तथ्य की जानकारी मिलती है कि सामान्य निधि खाते के अंतर्गत विश्वविद्यालय की आय का 70 से 90 प्रतिशत हिस्सा व्यय होता है। वर्ष 2000-01 में सामान्य निधि खाते के अंतर्गत कुल व्यय का 91.55 प्रतिशत हिस्सा व्यय हुआ जो वर्ष 2011-12 में कम कुल व्यय का 71.44 प्रतिशत हिस्सा रह गया। सामान्य निधि खाते के पश्चात् व्यय का दूसरा महत्वपूर्ण खाता विकास अनुदान खाता है। तालिका के अवलोकन करने पर स्पष्ट है कि वर्ष 2000-01 में जहाॅं इस खाते के अंतर्गत विश्वविद्यालय की कुल व्यय का 7.27 प्रतिशत हिस्सा व्यय हुआ, वह वर्ष 2011-12 में बढ़कर 27.14 प्रतिशत हो गया। अर्थात् अध्ययन अवधि मंे इस खाते के अंतर्गत होने वाले व्यय में लगभग 20.00 प्रतिशत बिंदु की वृद्धि हुई है। जहाॅं तक शारीरिक शिक्षा खाते का प्रश्न है, इसका अवलोकन करने पर यह तथ्य सामने आता है कि सामान्य निधि खाता एवं विकास अनुदान खाता इन दोनों की तुलना में शारीरिक शिक्षा खाते में होने वाला व्यय अत्यंत ही कम है। अध्ययन अवधि (2000-01 से 2011-12) में कुल व्यय में इसका प्रतिशत योगदान 1 से 4 प्रतिशत के मध्य ही है। इसे रेखाचित्र 1.6 से स्पष्ट किया गया है।
निश्कर्ष एवं सुझाव
विश्वविद्यालय मूल रूप से सामाजिक कल्याण के लिए स्थापित की गई संस्था है जिसका उद्देश्य आय अर्जित करना न हो कर समाज के विकास में भागीदार बनना है । विश्वविद्यालय का उद्देश्य उच्च शिक्षा को राज्य के हर वर्ग के विद्यार्थियों के लिए सुलभ बनाना है । जिसे प्राप्त करने के लिए शुल्क को युक्तियुक्त बनाने के साथ छात्र-छात्राओं को विभिन्न सुविधाएॅं भी उपलब्ध कराई जाती है । अध्ययन की प्रथम अवधि में विश्वविद्यालय को अधिकतम प्राप्तियाॅं सामान्य निधि खाते से होती थी परन्तु छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के पश्चात् स्थिति में परिवर्तन हुआ है । जिसके फलस्वरूप सामान्य निधि खाते से प्राप्तियों का कुल प्राप्तियों से प्रतिशत घटा है एवं विकास अनुदान खाते से प्राप्तियों का कुल प्राप्तियों में प्रतिशत योगदान बढ़ा है । यही स्थिति व्यय में भी रही है । अतरू कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के पश्चात विश्वविद्यालय के अनुदान प्राप्तियों में सार्थक वृद्धि हुई है । शारीरिक शिक्षण खाते से प्राप्तियों एवं व्यय का दोनों ही अवधियों में योगदान न्यूनतम रहा है । सामान्य निधि खाते के अंतर्गत परीक्षा मदों से प्राप्तियों में दोनों ही अवधियों में वर्ष दर वर्ष वृद्धि हुई है परन्तु यह वृद्धि द्वितीय अवधि में अधिक रही है । अंत में कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के पश्चात विश्वविद्यालय की वित्तीय स्थिति अधिक सुदृढ़ हुई है ।
विश्वविद्यालय के वित्तीय संसाधनों को ंभविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप किया जाना आवश्यक है इसके लिये नये-नये स्ववित्तीय पाठ्यक्रमों का विश्वविद्यालय में अध्यापन प्रारंभ किया जाना चाहिये। विश्वविद्यालय के प्रत्येक विभाग को प्राप्त होने वाली आय का एक निश्चित भाग विभाग के विकास में प्रयुक्त किया जाना चाहिये। ऐसे विषयों में अध्यापन कार्य प्रारंभ किये जाने चाहिये जो रोजगार दिलाने में सहायक सिद्ध हो, जिससे विश्वविद्यालय में छात्रों की संख्या में वृद्धि होगी। विश्वविद्यालय एवं उद्योग जगत के मध्य कड़ी स्थापित होनी चाहिये, जिससे अद्यौगिक जगत विश्वविद्यालय के विकास में योगदान दे सके। विभिन्न गतिविधियों एवं विश्वविद्यालय़ के ढ़ाचें का समुचित विकास करके छ।।ब् द्वारा प्राप्त रेटिंग ए ग्रेड तक पहंुचाय़ी जाए जिससे विश्वविद्यालय को अनुदान में वृद्धि होगी। विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संस्थायें जो प्रोजेक्ट के माध्यम से अनुदान प्रदान करती है। उनसे अनुदान प्राप्त कर विश्वविद्यालय के विकास में प्रयोग किया जाना चाहिये। प्राप्त अनुदानों का अनुकूलतम प्रयोग किया जाना चाहिये। निजी छात्रों के वायवा की जगह प्रोजेक्ट वर्क अथवा अतिरिक्त पेपर रखा जाय जिससे अनावश्यक खर्चों से बचत हो सकेगी। विश्वविद्यालय द्वारा अपने पिं्रटिंग पे्रेस को अद्यतन बनाकर परीक्षा परिणाम स्वयं के पिं्रटिंग प्रेस में छपवाये जाने चाहिये, जिससे विश्वविद्यालय के व्यय में बड़ी मात्रा में कमी आयेगी।
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Received on 21.11.2017 Modified on 28.11.2017
Accepted on 22.12.2017 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Ad. Social Sciences. 2017; 5(4):237-247.